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उत्तराखंड की राजनीति में एक और जनरल का उदय

गुणानंद जाखमोला, उत्तरजन टुडे, देहरादून।

दो पूर्व जनरलों मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी और ले. जनरल टीपीएस रावत ने उत्तराखंड की राजनीति में एक मुकाम हासिल किया। दोनों ही जनरल भले ही आज राजनीति में हाशिए पर हैं, लेकिन दोनों का अपना रुतबा रहा है। राजनीतिक कीचड़ में दामन झुलसा लेकिन अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब रहे। दोनों ही जनरलों को ईमानदार माना जाता है। पहाड़ के युवाओं को रोजगार देने में जनरल टीपीएस रावत का कोई सानी नहीं है। उनको पहाड़ के युवा आज भी याद करते हैं। जनरल खंडूड़ी ने राजनीतिक शुचिता को बनाए रखा, हालांकि सारंगी ने उनकी इस छवि की पीपरी बजा दी। 

आप के प्रदेश उपाध्यक्ष बने मेजर जनरल डा. सीके जखमोला

गेस्ट्रो सर्जन करेंगे प्रदेश के राजनीतिक कैंसर का इलाज!

ऐसे समय में जब भाजपा और कांग्रेस के दोनों दिग्गज जनरल जीवन की सांध्यबेला में अकेलेपन का शिकार हैं, उत्तराखंड की राजनीति में एक नये जनरल का प्रादुर्भाव हुआ है। ये हैं पूर्व मेजर जनरल डा. चंद्र किशोर जखमोला। आम्र्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विस से सेवानिवृत्त हुए हैं। जनरल डा. जखमोला जर्नल सर्जन हैं और गेस्ट्रो में पारंगता है। यानी कैंसर का इलाज भी करते हैं। वे आरआर, एम्स दिल्ली में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने सेना के विभिन्न अस्पतालों में विभिन्न पदों पर काम किया। वे भारतीय सेना के पहले ऐसे सर्जन हैं जिन्होंने सेना अस्पतालों में एडवांस लेप्रोस्कोपिक ओंको जीआई सर्जनी और लेप्रोस्कोपिक हर्निया सर्जरी की शुरूआत की। 

जनरल डा. जखमोला ने परम्परागत भाजपा और कांग्रेस से अलग हटकर आम आदमी पार्टी को चुना। आप का अभी प्रदेश में कोई प्रभाव नहीं है। महज खानापूर्ति वाली पार्टी मानी जा रही है। इसके बावजूद जनरल जखमोला का आप को ज्वाइन करना चुनौती से कम नहंी है। आप के ही नेता मानते हैं कि वे बहुत व्यस्त रहते हैं तो क्या राजनीति में समय दे पाएंगे?  सवाल उठ रहे हैं कि जनरल जखमोला क्या दो पूर्व जनरलों के राजनीति विरासत को बचाने में कामयाब हो पाएंगे या उन्हें प्रदेश के पूर्व सैनिक, सैनिक और आम लोग उसी तर्ज पर अपनाएंगे जैसे जनरल खंडूड़ी और जनरल रावत को अपनाया? 

जनरल डा. जखमोला को उत्तराखंड का जनमानस कितना महत्व देगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि दो जनरलों की सक्रिय राजनीति से विदाई से जो गैप नजर आ रहा था, निश्चित तौर पर जनरल जखमोला के राजनीति में आने से वह गैप कुछ तो कम जरूर हुआ है। सैनिक बहुल प्रदेश में सैनिकों और पूर्व सैनिकों को महज वोट बैंक ही समझा जाता है, उनको राजनीतिक अधिकार और सम्मान देने से भाजपा और कांग्रेस समान दूरी बनाए रखते हैं। ऐसे में जनरल जखमोला पर अब पूर्व सैनिकों और सैनिकों की नजर होगी। उत्तराखंड में जोर-अजमाइश में जुटी आम आदमी पार्टी ने यह एक अच्छा प्रयोग किया है।

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