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Showing posts from November, 2020

उत्तराखंड की राजनीति में एक और जनरल का उदय

गुणानंद जाखमोला, उत्तरजन टुडे, देहरादून। दो पूर्व जनरलों मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी और ले. जनरल टीपीएस रावत ने उत्तराखंड की राजनीति में एक मुकाम हासिल किया। दोनों ही जनरल भले ही आज राजनीति में हाशिए पर हैं, लेकिन दोनों का अपना रुतबा रहा है। राजनीतिक कीचड़ में दामन झुलसा लेकिन अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब रहे। दोनों ही जनरलों को ईमानदार माना जाता है। पहाड़ के युवाओं को रोजगार देने में जनरल टीपीएस रावत का कोई सानी नहीं है। उनको पहाड़ के युवा आज भी याद करते हैं। जनरल खंडूड़ी ने राजनीतिक शुचिता को बनाए रखा, हालांकि सारंगी ने उनकी इस छवि की पीपरी बजा दी।  आप के प्रदेश उपाध्यक्ष बने मेजर जनरल डा. सीके जखमोला गेस्ट्रो सर्जन करेंगे प्रदेश के राजनीतिक कैंसर का इलाज! ऐसे समय में जब भाजपा और कांग्रेस के दोनों दिग्गज जनरल जीवन की सांध्यबेला में अकेलेपन का शिकार हैं, उत्तराखंड की राजनीति में एक नये जनरल का प्रादुर्भाव हुआ है। ये हैं पूर्व मेजर जनरल डा. चंद्र किशोर जखमोला। आम्र्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विस से सेवानिवृत्त हुए हैं। जनरल डा. जखमोला जर्नल सर्जन हैं और गेस्ट्रो में पारंगता है। यानी कैंसर का इलाज भी

विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती

विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती अमरेन्द्र सुमन, चरखा फीचर, दुमका, झारखंड।  बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल (प्लास्टिक, फाइबर व अन्य मिश्रित धातुओं से निर्मित) वस्तुओं का उत्पादन और घर घर तक इनकी पहुँच से जहाँ एक ओर कुम्हार (प्रजापति) समुदाय के पुश्तैनी कारोबार को पिछले कुछ वर्षों से भारी क्षति का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर चीन निर्मित वस्तुओं का आयात और बड़े पैमाने पर भारत के बाजारों में उनका व्यवसाय भी उनके आर्थिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण रहा हैं। गरीबी, अशिक्षा, आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर उपेक्षित जीवन, रुग्न मानसिकता, माटी कला बोर्ड की स्थापना का न होना, काम के प्रति अनिच्छा, महंगाई, हाथ निर्मित वस्तुओं की मांग में भारी कमी, उन्नत शिल्प का अभाव और तकनीकी शिक्षा की कमी उन्हें उनके पुश्तैनी पेशे से दूर करता रहा है।  पहले जिस तरह कुम्हार समुदायों में दुर्गापूजा, दीपावली और छठ जैसे व्रतों में मिट्टी से निर्मित वस्तुओं के निर्माण की जो तत्परता और खुशी दिखाई पड़ती थी, अब उसमें आसमान-जमीन का अंतर हो चुका है। सामान बनाने के अनुकूल मिट्टी की कमी, कच्ची मिट्टी की वस्तुओं

शराब मुक्त उत्तराखंड की लड़ाई लड़ते डीके जोशी

एडवोकेट डी. के. जोशी जगमोहन रौतेला, युगवाणी, अक्टूबर 2019, देहरादून उच्च न्यायालय नैनीताल में अधिवक्ता हैं गरुड़ (बागेश्वर) के दरसानी व निवासी डीके जोशी। जो शराब-मुक्त उत्तराखंड की कानूनी लड़ाई उच्च न्यायालय में लड़ रहे हैं।  जिसमें एक बड़ी सफलता उन्हें पिछले दिनों मिल भी चुकी है। उच्च न्यायालय ने गत 29 अगस्त 2019 को अपने एक निर्णय में उत्तराखंड की भाजपा सरकार को निर्देश दिया, कि वह राज्य मद्य-निषेध को लागू करने के लिए चरणबद्ध तरीके से कदम उठाए और इस मामले में की गई कार्रवाई से उच्च न्यायालय को 6 महीने बाद अवगत कराएं। गरुड़ (बागेश्वर) निवासी अधिवक्ता डीके जोशी द्वारा इस संबंध में दायर की गई जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायाधीश आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ ने याचिका का निस्तारण करते हुए प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम-1910 के संशोधित अधिनियम-1978 की धारा- 37(ए) के अनुपालन में प्रदेश में मद्यनिषेध को चरणबद्ध तरीके से लागू करे। न्यायालय ने प्रदेश सरकार को राज्य की सभी शराब की दुकानों एवं बार रेस्टोरेंट में आईपी-एड्रेस युक्त सीसीटीवी लगाने

लघु उद्योग बदल सकते है पहाड़ी गांवों का स्वरूप

नैनीताल, उत्तराखंड नरेन्द्र सिंह बिष्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में बेरोज़गारी दर 2004-2005 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2017-2018 में 4.2 प्रतिशत थी जो राज्य सरकार के लिए चिन्ता का विषय है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उच्च बेरोज़गारी दर के पीछे सरकारी व निजी क्षेत्रों में रोज़गार के पर्याप्त अवसर पैदा करने में राज्य की अक्षमता है। रिपोर्ट यह भी बता रही है कि 2004-2005 से 2017-2018 तक युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर 6 प्रतिशत से बढ़कर 13.2 प्रतिशत हो गई। शिक्षित युवाओं (माध्यमिक स्तर से ऊपर) के बीच बेरोज़गारी दर सबसे अधिक 17.4 प्रतिशत है। उत्तराखण्ड बेरोज़गारी मंच के राज्य प्रमुख सचिन थपलियाल ने बताया गया कि राज्य में नौ लाख से अधिक पंजीकृत बेरोजगार युवा हैं। सरकारें बड़े उद्योग एवं रोजगारों को राज्य में लाने में विफल रही है। वही ग्रामीण समुदाय अपने स्तर पर लद्यु उद्योगों के माध्यम से अपनी आजीविका संवर्धन कर रही है। इस ओर सरकार व निजी कंपनियों को कार्य करने की आवश्यकता है। जिससे ग्राम स्तर पर रोज़गार के साथ साथ पहाड़ी

पांवटा दून के आराध्य हैं पातलियों महादेव

गोपाल दिलैक पांवटा दून से अंबाला-देहरादून राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर बात्ता मण्डी के समीप भूमध्य रेखा से  30°26'14.5"उत्तर 77°33'54.5"पूर्व पर स्थित समुद्रतल से लगभग 398 मीटर की ऊंचाई पर पातलियों महादेव का मंदिर पातलियों में स्थित है। यह मंदिर साल के वृक्षों से घिरा है। इस मंदिर का निर्माण आधुनिक ढंग की निर्माण सामग्री कंकरीट के साथ हुआ है। यह मंदिर निम्न शिवालिक पर्वत श्रेणी के दूरस्थ छोर पर है। यहां समस्त भूभाग शैव अध्ष्ठित प्रतीत होता है। इस मंदिर के प्रधान अराध्य देव लिंग स्वरूप शिव हैं। यह शिवलिंग पृथ्वी के संसर्ग से स्थापित होने के फलस्वरूप इसकी व्युत्पत्ति लोक से बताई गई है। धरती के मूल से व्युत्पन्‍न इस शिवलिंग की अनुमानित लम्बाई 10 फीट तथा गोलाई 10-12 फीट के आसपास है। इस शिवलिंग को अलौकिक शक्ति के चमत्कार की रचना कहा जा सकती है। यद्यपि इस पार्थिक शिवलिंग का तमन्मय होकर ध्यान किया जाये तो ज्ञात होता है कि यह वर्ष भर में अनेक रूप बदलता है। यह प्रस्तर शिवलिंग भूलत से उठकर एक समान गोलाई में दिखाई पड़ता है जबकि शिखर अधिक मोटाई में दिखाई देता है। यह शिवलिंग वास्तव में

हाशिये पर खड़ा पहाड़िया समाज

संथाल परगना प्रमण्डल के हरित पर्वत मालाओं, घने जंगलों, स्वच्छंद नदी-नालों तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए अंग्रेजों, जमींदार और महाजनों जैसे शोषक वर्गों से लोहा लेने वाली आदिम जाति पहाड़िया समुदाय का अपना एक विशिष्ट इतिहास रहा है। इसे भारत की दुर्लभ जनजातियों में से एक माना जाता है। उपलब्ध दस्तावेज़ों व प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पहाड़िया समुदाय संथाल परगना प्रमण्डल के आदि काल के बाशिंदे हैं। 302 ई.पूर्व सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य के शासनकाल में पाटलिपुत्र की यात्रा पर आए प्रसिद्ध यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपने यात्रा-वृत्तांत में इस क्षेत्र के निवासियों को मल्लि अथवा माली शब्द से परिभाषित किया था। मेगास्थानीज के तकरीबन 950 वर्ष बाद हर्षवर्द्धन के शासनकाल (645 ई०) में भारत भ्रमण के दौरान चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में पहाड़िया का उल्लेख करते हुए इन्हें इस क्षेत्र का आदि मानव कहा।   15वीं व 16वीं शताब्दी में आदिम जाति पहाड़िया का इतिहास प्रमाणित रूप से सामने आया, जब संथाल परगना के राजमहल, मनिहारी, लकड़ागढ़, हंडवा, गिद्धौर, तेलियागढ़ी, महेशपुर राज, पाकुड़ व सनकारा म