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नवरात्रि का दूसरा दिन, मां ब्रह्मचारिणी की आराधना का दिन

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ- ब्रह्म मतलब तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली देवी होता है। मां ब्रह्मचारिणी के हाथों में अक्ष माला और कमंडल सुसज्जित हैं। अगर मां का सच्चे मन से पूजन किया जाए तो व्यक्ति को ज्ञान सदाचार लगन, एकाग्रता और संयम रखने की शक्ति प्राप्त होती है।

मान्यता के अनुसार इन्हें तप की देवी कहा जाता है. क्योंकि इन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. वह सालों तक भूखे प्यासे रहकर शिव को प्राप्त करने के लिए इच्छा पर अडिग रहीं. इसीलिए इन्हें तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है. ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी माता का यही रूप कठोर परिश्रम की सीख देता है, कि किसी भी चीज़ को पाने के लिए तप करना चाहिए. बिना कठिन तप के कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता.

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विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती

विलुप्त होती कला को बचाने की चुनौती अमरेन्द्र सुमन, चरखा फीचर, दुमका, झारखंड।  बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल (प्लास्टिक, फाइबर व अन्य मिश्रित धातुओं से निर्मित) वस्तुओं का उत्पादन और घर घर तक इनकी पहुँच से जहाँ एक ओर कुम्हार (प्रजापति) समुदाय के पुश्तैनी कारोबार को पिछले कुछ वर्षों से भारी क्षति का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर चीन निर्मित वस्तुओं का आयात और बड़े पैमाने पर भारत के बाजारों में उनका व्यवसाय भी उनके आर्थिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण रहा हैं। गरीबी, अशिक्षा, आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर उपेक्षित जीवन, रुग्न मानसिकता, माटी कला बोर्ड की स्थापना का न होना, काम के प्रति अनिच्छा, महंगाई, हाथ निर्मित वस्तुओं की मांग में भारी कमी, उन्नत शिल्प का अभाव और तकनीकी शिक्षा की कमी उन्हें उनके पुश्तैनी पेशे से दूर करता रहा है।  पहले जिस तरह कुम्हार समुदायों में दुर्गापूजा, दीपावली और छठ जैसे व्रतों में मिट्टी से निर्मित वस्तुओं के निर्माण की जो तत्परता और खुशी दिखाई पड़ती थी, अब उसमें आसमान-जमीन का अंतर हो चुका है। सामान बनाने के अनुकूल मिट्टी की कमी, कच्ची मिट्टी की वस्तुओं

शोधकर्ताओं ने विकसित किया वाष्पीकरण मापने का बेहतर यंत्र

नई दिल्ली, 04 दिसंबर (इंडिया साइंस वायर): बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक नया उपकरण विकसित किया है, जो किसी क्षेत्र में वाष्पीकरण की दर को कुछ ही क्षणों में सरल और सटीक ढंग से माप सकता है। यह नया यंत्र पौधों से वाष्पोत्सर्जन और मिट्टी से वाष्पीकरण की बेहतर माप प्राप्त करने में प्रभावी पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नया उपकरण वाष्पीकरण मापने के उपलब्ध तरीकों की तुलना में कहीं अधिक सक्षम और सस्ता विकल्प है। भारतीय विज्ञान संस्थान के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर जयवंत एच. अरकेरी ने बताया कि "वाष्पीकरण दर मापने के लिए आमतौर पर पात्र वाष्पन मीटर (Pan Evaporimeter) का उपयोग होता है। यह एक बड़े पात्र के आकार में होता है, जो पानी से भरा रहता है। एक दिन के दौरान पात्र में भरे पानी के स्तर में बदलाव उस क्षेत्र में वाष्पीकरण की दर को दर्शाता है। मौजूदा तरीकों की एक खामी यह है कि इससे पूरे दिन और बड़े क्षेत्र (1 वर्ग मीटर) में वाष्पीकरण की दर पता चल पाती है। इसके अलावा, उपकरण लगाने के लिए खुले मैदान की जरूरत होती है। लेकिन, हमने एक

लघु उद्योग बदल सकते है पहाड़ी गांवों का स्वरूप

नैनीताल, उत्तराखंड नरेन्द्र सिंह बिष्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में बेरोज़गारी दर 2004-2005 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2017-2018 में 4.2 प्रतिशत थी जो राज्य सरकार के लिए चिन्ता का विषय है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उच्च बेरोज़गारी दर के पीछे सरकारी व निजी क्षेत्रों में रोज़गार के पर्याप्त अवसर पैदा करने में राज्य की अक्षमता है। रिपोर्ट यह भी बता रही है कि 2004-2005 से 2017-2018 तक युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर 6 प्रतिशत से बढ़कर 13.2 प्रतिशत हो गई। शिक्षित युवाओं (माध्यमिक स्तर से ऊपर) के बीच बेरोज़गारी दर सबसे अधिक 17.4 प्रतिशत है। उत्तराखण्ड बेरोज़गारी मंच के राज्य प्रमुख सचिन थपलियाल ने बताया गया कि राज्य में नौ लाख से अधिक पंजीकृत बेरोजगार युवा हैं। सरकारें बड़े उद्योग एवं रोजगारों को राज्य में लाने में विफल रही है। वही ग्रामीण समुदाय अपने स्तर पर लद्यु उद्योगों के माध्यम से अपनी आजीविका संवर्धन कर रही है। इस ओर सरकार व निजी कंपनियों को कार्य करने की आवश्यकता है। जिससे ग्राम स्तर पर रोज़गार के साथ साथ पहाड़ी