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तैरने वाला समाज डूब गया !

ओमप्रकाश भारती 

भारतीय वेद और पुराणों में कोसी को पुण्यवती सरिता कहा गया है। उसकी प्रशस्ति गयी गई है। सभ्यता के विकास के क्रम में मानव द्वारा नदियों का दोहन आरंभ हुआ। मानव समुदाय की कोशिश रही कि नदी को उसके अनुचारिणी की तरह व्यवहार करनी चाहिए। नदी मानव मन के अनुकूल व्यवहार करे तो वो वरदान है।

यदि वे अपने धर्म को निभाये तो अभिशाप। बाढ़ आना, प्रवाह मार्ग बदलना नदियों का धर्म है, उसके आचरण की अनिवार्यता है। मानव और नदियों के बीच इस अन्तरद्वन्द ने मानव के लिए नदियों को अभिशाप बना दिया। इनमें से कोसी भी इसी प्रकार की एक नदी है। कोसी के बदलते प्रवाह मार्ग और अप्रत्याशित बाढ़ के केन्द्र में उसकी भौगोलिक स्थिति और मानवीय हस्तक्षेपहै, जिसको जानना और स्वीकार करना हमारे लिए अपरिहार्य है।

1965 ई. में कोसी तटबंध बनकर तैयार हुआ। कोसी की अनियंत्रित धाराओं को तटबंधों के द्वारा नियंत्रित किया गया। तबसे लेकर आज तक कोसी सात बार तटबंधों को तोड़कर मुक्त होने में सफल रही। मसलन कोसी ने जब-जब चाहा तटबंधों को तोड़ डाला। इस तबाही में अब तक पचास हजार से ऊपर लोग कालकवलित हो चुकें हैं। बाढ और तटबंधों के कारण अब तक लगभग तीन लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। ये विस्थापित लोग कहां और किस स्थिति में हैं इसे जानने की आवश्यकता प्रजातांत्रिक व्यवस्था की इस सभ्य समाज को कभी नहीं रही (?) ।

8 अगस्त, 2008 को कुसहा में तटबंध का टूटना अबतक की सबसे बड़ी त्रासदी है। कहा जा रहा है कि कुसहा में जानबुझकर तटबंध को तोड़ा गया। यह भले सच न हो, लेकिन  इतना तो अवश्य है कि तटबंध को टूटने के लिये छोड दिया गया और तटबंध टूटने के बाद लोगों को मरने के लिये छोड़ दिया गया।

तटबंध टूटने के पांच दिनों के बाद राहत दल पहुंचा। तबतक हजारों लोग कालकवलित हो चुके थे।छोटे से देश नेपाल में लोगों को पूर्व सूचना दी गयी। गाँव खाली कर लिये गये।...। राहत दल आया। सफेद बगुला और गिद्धों के झुंड लाशों के इर्द-गिर्द मडराने लगे। स्वेच्छिक संगठन, नदी-बाढ़ विशेषज्ञ, साहित्यकारों के झुंड आ धमके। खबरिया चैनल भी आया। विशेषज्ञ ने तुर्रा छोड़ा, साहित्यकारों की लेखनी बिलख पड़ी।खबरिया चैनल के सौजन्य से- हम किस तरह बिलबिला रहे थे, डूब रहे थे उसे दुनियां भर के लोगों ने देखा।...सब कुछ शांत, कोसी मैया शांत हो गयी। बांध बंध रहा है। हम पुनः बांध टूटने की प्रतीक्षा में खामोशी से जियेंगे( ?)।

दुनियां की नदियों में कोसी नदी का भौगोलिक स्वरूप बिलकुल भिन्‍न है। और इस भिन्‍नता का ज्ञान केवल कोसी अंचल के लोगों को ही है। आज विज्ञान ने भले ही पूरी दुनियां को एक मंच पर समायोजित कर दिया है। विज्ञान के पास अचूक-चूक समाधान है, लेकिन समाज सिर्फ विज्ञान से नियंत्रित और संचालित नहीं होता। खासकर भारत जैसे देश में जहां सिर्फ कोसी नदी के बेसिन में दो करोड़ से अधिक लोग रहते हें। यहाँ तो सामाजिक साहचर्य और दायित्वबोध जैसे आधारभूत मानवीय भावनाओं के सहारे प्रगति के पथ पर अग्रसर होना होगा। कोसी के लोगों को कोसी नदी से जुड़ा पारम्परिक ज्ञान है। आप वर्षो से तैरते रहे हैं। भला महानगरों के तरण-ताल में प्रशिक्षित तैग।क आपको कोसी की धारा से कैसे बचाएंगें? आप तो तैराक हैं, फिर आपने लोगों को डूबते कैसे देखा? समय रहते आत्मविश्लेषण कौजिए। आज दुनियां भर के लोग आपसे पूछ रहें

कुसहा में तटबंध टूटने के बाद जो जान-माल की क्षति हुई वह अभूतपूर्व है। सारा दोष सरकार और व्यवस्था के ऊपर थोपा जा रहा है। हम अपनी सारी ऊर्जा इसमें लगा रहे हैं कि सरकारी चूक कहाँ हुई। सरकार तो दोषी है ही। प्रजातांत्रक व्यवस्था में सरकार पर ही उंगलियाँ उठती रही है। समाज अदृश्य रहा है। प्रजातांत्रक सरकार तो चाहती ही है कि जनता अपनी समस्याओं के प्रति अनभिज्ञ रहे। और इसके लिए तो अब हम पिछले सौ वर्षो में प्रशिक्षित और प्रवीण हो चुके हैं। सामाजिक दायित्व और भूमिका तो पता नहीं कहाँ हवा हो गयी।

कोसी नदी है और रहेगी। आने वाले दिनों में प्राकृतिक असंतुलग और “ग्लोबलवार्मिग'” के कारण नदी की स्थिति और भयावह होगी। तटबंध फिर कभी टूटेगा, हमें कौन बचाने आयेगा! क्‍या हम पानी में ही डूब कर मरते रहेंगे?- कुसहा त्रासदी के बाद ऐसे कई यक्ष प्रश्नों के उतर हमें देने होंगे। नई अर्थव्यवस्था (बाजारबाद) ने समाज के पारम्परिक बुनियादी साहचर्य के संबधों में उदासीनता ला दी है। व्यक्तिवादी दृष्टिकोण के चलते समाज सामूहिक दायित्व से 'कतरा रहा है। सत्ता लोलुप दलीय राजनीतिक पद्धति ने लोगों को भ्रमित किया है। समय रहते इस अंचल के लोगों को पारम्परिक ज्ञान और सामाजिक दायित्वबोध तथा साहचर्य की चेतना को पुनर्जीवित करना होगा। कोसी इस अंचल की प्राथमिक और सबसे बड़ी समस्या है। समाज को आगे आकर अपने दायित्वको स्वीकार करना होगा। इतनी बड़ी समस्या को सिर्फ सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।






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