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उत्तराखंड का एक ऐसा नेता जिसे सभी दल के नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

 



एनडी तिवारी उत्तराखंड के ऐसे नेता थे जिनकी आज भी लोग  मिसाल देते है । एनडी तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल में हुआ था, तब वह उत्तरप्रदेश का हिस्सा था। यूपी में  एनडी तिवारी का कार्यकाल 1976 से 1977, 1984 से 1985 और 1988 1989 तक रहा.  वही उत्तराखण्ड में 2002 से 2007 तक एनडी तिवारी का शासनकाल रहा। 

इसके साथ ही 2007 से 2009 तक वह  आंध्र प्रदेश के गवर्नर भी रहे। 27 साल की उम्र में एनडी तिवारी ने विधानसभा  चुनाव लड़ा लेकिन उन्होंने यह चुनाव कांग्रेस से नहीं प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा  1952 के बाद 1957 मे भी उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और  जीत हासिल कर विपक्ष के नेता बन गए। साल 1963 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। 

एनडी तिवारी कांग्रेस के उस समय के नेता हैं  जब  कांग्रेस जमीनी स्तर पर काफी मजबूत हुआ करती थी और उस समय उसके पास जमीनी नेताओं की भरमार होती थी। जो काफी लोकप्रिय भी होते थे, और जनता से डायरेक्ट संपर्क रखते थे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले नेता

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी  बताते हैं कि नारायण दत्त तिवारी समाजवादी नेता थे भारत के  कई राजनेताओं का ताल्लुक भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से रहा है, उनकी यादाश। जबरदस्त थी उन्हें रामायण गीता जबानी याद थी और आंकड़े उनकी उंगलियों में रहते थे, कहा जाता था कि  बजट के समय अफसर  उनके पास  अपनी फाइल ले जाने में डरते थे , क्योंकि वह गलतियां पकड़ लेते थे, राजनीति अर्थशास्त्र की उनको गहरी समझ थी । जब तक वह यूपी के मुख्यमंत्री रहे  तब तक उन्होंने काफी अच्छे काम किये।  केंद्र में राजीव गांधी कैबिनेट में वित्त व विदेश  मंत्री के रूप में भी कम किया था।  

2 राज्य के मुख्यमंत्री का रहा रिकॉर्ड 

तिवारी उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे,जो बाद में उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक अलग राज्य बना । अभी तक वह प्रदेश के ऐसे  पहले  मुख्यमंत्री थे जिन्होंने 5 साल शासन किया। 

नारायणदत्त तिवारी महज 800 वोटों से प्रधानमंत्री नही बन पाए 

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के सामने  नेतृत्व संकट गहरा गया था  ऐसे में  कांग्रेस  की कमान वरिष्ठ दो ही नेताओं के पास आ सकती थी नारायण दत्त तिवारी और नरसिम्हा राव।  नरसिम्हा राव कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुने गए। लेकिन स्थिति यह थी कि  अगर तिवारी चुनाव जीत गए तो वही प्रधानमंत्री बनेंगे।  लेकिन लोकसभा चुनाव में 800 वोटों से उनकी हार हुई पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बन गए ।

नरेंद्र तिवारी पहाड़ के नेता के रूप में जाने जाते थे और उनका कद भी राजवी गांधी के समय मे  लालकृष्ण आडवाणी, वीपी सिंह अटल बिहारी वाजपयी, जॉर्ज फर्नाडिस के कद के नेता के रूप में जाने जाते थे। 

औद्योगिक शहर नोएडा की की स्थापना

आज कई नेताओं जैसे नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष के रूप में जाना जाता है तो वहीं नरेंद्र तिवारी ने कई वर्षों पहले अपनी भी यही छवि बनाई थी। नारायण दत्त तिवारी ने यूपी के अपने कार्यकाल में राज्य का काफी विकास किया था। 

औद्योगिक शहर नोएडा की स्थापना करने में भी नारायण दत्त तिवारी का बड़ा हाथ है बतौर यूपी के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता  संजय गांधी के आग्रह  पर  दिल्ली से सटे इलाकों में ज़मीन एकत्र की और एक औद्योगिक नगर बसाया. यह उत्तर प्रदेश का सबसे अधिक  राजस्व देने वाला और सबसे औद्योगिक इलाका है. जब नोएडा को बने 25 वर्ष हुए तो उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि "वे काफी दुखी थे कि हमने नोएडा का गठन किया था. आज वहां हमारे ही बनाए लोग हैं लेकिन हमें पूछ भी नहीं रहे.’

सभी दल के नेताओं  के साथ रहे मधुर संबंध 

कहा जाता है कि नरेंद्र तिवारी के  सभी दल के नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते थे। उनका हर किसी को पसंद आता था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उनकी काफी इज्जत करते थे और उन्हें सर कहकर बुलाते थे लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री को मना किया कि वह उन्हें सर ना बोले जिसको पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी समझा

चरित्र पर कई बार उठे सवाल

अवैध संबंधों को लेकर एनडी तिवारी पर कई सवाल उठे 2009 में जब वह आन्ध्रप्रदेश  प्रदेश के राज्यपाल थे तब एक समाचार चैनल में तीन महिलाओं के साथ एक सेक्स स्कैंडल प्रसारित हुआ था जिसके बाद उन्हें राज्यपाल के पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

इसके बाद 2008 में रोहित शेखर ने मुकदमा दायर किया कि वे नारायण दत्त तिवारी के बेटे हैं. तिवारी इस बात को खारिज करते रहे लेकिन बाद में डीएनए जांच में यह बात सही पाई गई. 2014 में तिवारी ने 89 वर्ष की आयु में रोहित शेखर की मां उज्जवला से शादी कर 

आखिरी सालों में लगे उन पर चरित्र हनन ने उनको काफी हानि पहुंचाई। और देश की राजनीति में उनकी छवि धूमिल हुई। जिसके कारण उन्होंने  अपनी राजनीतिक साख भी खोई। 

अच्छे राजनीतिक जीवन सरल स्वभाव के कारण उन्हें आज भी याद रखा जाता हैआज उनकी दूसरी पुण्यतिथि है इस अवसर पर उत्तराखंड समेत देश के सभी दलों की  नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।


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