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Showing posts from October, 2020

स्टार्टअप कंपनियों ने विकसित की कोरोना संक्रमण से बचाव की नयी तकनीकें

ओरल कैंसर के लिए स्टार्टअप नई दिल्ली, 27 अक्तूबर (इंडिया साइंस वायर): कोरोना वायरस के संक्रमण से सुरक्षा के लिए रासायनिक सैनिटाइजर अथवा साबुन से बार-बार हाथ धोना दैनिक जीवन का एक अंग बनता जा रहा है। हालांकि, बार-बार ऐसा करने से न केवल हाथ रूखे हो जाते हैं, बल्कि हाथों में खुजली भी होने लगती है। सब कुछ ठीक रहा तो कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए पेश की जा रही भारत की स्टार्टअप कंपनियों की अभिनव तकनीकों के जरिये इस समस्या का समाधान मिल सकता है। वास्तव में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग एवं देश के अन्य वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा समर्थित विभिन्न स्टार्टअप कंपनियां कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए अब अधिक सुरक्षित विकल्प पेश कर रही हैं।  नये रोगाणुनाशियों का विकास राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी उद्यमिता विकास बोर्ड (NSTEDB) एवं सोसाइटी फॉर इनोवेशन ऐंड एंटरप्रेन्योरशिप (एसआईएनई) की संयुक्त पहल पर आधारित है। ये तकनीकें दस कंपनियों ने मुहैया करायी हैं, जिन्हें सेंटर फोर ऑगेमेंटिंग वॉर विद कोविड-19 हेल्थ क्राइसिस (सीएडब्ल्यूएसीएच) के तहत रोगजनक सूक्ष्मजीवों एवं वायरस के शोधन और सैनिटाइजेश

फसल ख़राबी से किसान हैं परेशान

श्रवण हुर्रा कांकेर, छत्तीसगढ़। नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर में किसानों के साथ सामाजिक संगठनों से लेकर बड़े बड़े राजनीतिक दल विरोध दर्ज करा रहे हैं। वहीं किसान सड़कों पर उतर कर इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी खड़ी फसलों को कीट पतंगों की प्रकोप से बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। मौसम की बेरुखी की मार एक बार फिर किसानों पर ही पड़ी हैं। जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें पकने की कगार पर पहुंची फसलों पर कीट प्रकोप के रूप में हो रहा है। कृषि विभाग के अनुसार छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले की लगभग 10 प्रतिशत फसलों में कीटों का प्रकोप देखा जा रहा है। जिला मुख्यालय कांकेर से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भानुप्रतापपुर ब्लाॅक के ग्राम घोठा के किसान कीटों के कारण अपनी तैयार फसलों को बर्बाद होते देख चिंतित हैं। लगभग 1500 की आबादी वाले इस गांव के लोग कृषि पर ही निर्भर हैं। खेतों में बुआई के समय मौसम की पर्याप्त पानी मिलने से किसानों ने अच्छी पैदावार का अनुमान लगाया था। शुरूआत के कुछ समय मौसम भी कृषि के अनुकूल रहा। लेकिन अगस्त, सितंबर में अच्छ

अस्पताल है, मगर डॉक्टर नहीं

फूलदेव पटेल मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार पूरे देश में सरकारी अस्पताल की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। आये दिन अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली व आरजकता की ख़बरें अखबार की सुर्खियों में रहती है। उप्र, झारखंड, बिहार समेत कई राज्यों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का बुरा हाल है, तो दूसरी ओर इन्हीं क्षेत्रों में निजी अस्पतालों की चांदी है। सरकारी डाक्टर प्राइवेट क्लीनिक खोलकर अपनी दुकान चमकाने में मुस्तैद हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकारी अस्पताल की चहारदीवारी से लेकर मेन गेट पर भले ही नारे लिखे बड़े-बड़े होर्डिंग व पोस्टर लगे होते हों, लेकिन अंदर स्वास्थ्य सेवा के नाम पर अनमने ढंग से मरीजों का इलाज किया जाता है। डॉक्टर से लेकर सफाई कर्मचारी तक की कोशिश होती है कि मरीज उनके कमीशन प्राप्त प्राइवेट अस्पताल चला जाये। यह स्थिती केवल शहरों की ही नहीं है बल्कि प्रखंड स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बैठने वाले डाक्टर भी अपना निजी क्लीनिक चलाने में मशगूल रहते हैं। अस्पताल प्रशासन की लापरवाहीए बदइंतजामी और कुव्यवस्था के कारण गरीब मरीज़ भी निजी क्लीनिक में इलाज कराने को मजबूर हो जाते हैं। देश म

गाँव भदास में लॉकडाउन के तहत ग्रामीण और प्रशासन का आपसी सहयोग बना मिसाल

जुनैद खां, सहगल फाउंडेशन 2020 के शुरुआत से कोरोना वायरस महामारी पूरे विश्व में तेज़ी से फैलती दिख रही है। भारतवासियों ने भी इसका प्रभाव देश भर में महसूस किया, और अभी तक संक्रमित लोगों की संख्या पूरे देश में बढ़ती चली जा रही है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए भारत में २२ मार्च से लाक्डाउन लगाया गया था। देशभर में लोगों को अपने घरों से निकलने परमनाही थी, जिससे वह संक्रमित होने से बच सके और वायरस को फैलने से रोका जा सके। इस लॉकडाउन का पूरे देश में गहरा प्रभाव रहा, बड़े बड़े शहरों से लेकर छोटे छोटे गाँव तक सभी लोगों को | 2700 लोगों का काम, व्यापार, तो बंद हुआ ही साथ ही इसका सीधा प्रभाव कृषि से जुड़े कामों पर भी दिखाई दिया। हरियाणा के नगीना खंड में बसे भादस गाँव में भी लॉकडाउन का असर पूरी तरह से पड़ा परंतु प्रशासन को सहयोग देने कि गाँव वालो ने लॉकडाउन के नियमों का पालन किया और एकजुट होकर गाँव की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई.गाँव में सोशल डिस्टन्सिंग का पालन अच्छे से किया गया। नगीना खंड की पुलिस गाँव-गाँव जाकर लोगों को सूचितकर रही थी, और कोई भी व्यक्ति के बेवजह बाहर दिखने पर उनको घर मेज रही थी।

तैरने वाला समाज डूब गया !

ओमप्रकाश भारती  भारतीय वेद और पुराणों में कोसी को पुण्यवती सरिता कहा गया है। उसकी प्रशस्ति गयी गई है। सभ्यता के विकास के क्रम में मानव द्वारा नदियों का दोहन आरंभ हुआ। मानव समुदाय की कोशिश रही कि नदी को उसके अनुचारिणी की तरह व्यवहार करनी चाहिए। नदी मानव मन के अनुकूल व्यवहार करे तो वो वरदान है। यदि वे अपने धर्म को निभाये तो अभिशाप। बाढ़ आना, प्रवाह मार्ग बदलना नदियों का धर्म है, उसके आचरण की अनिवार्यता है। मानव और नदियों के बीच इस अन्तरद्वन्द ने मानव के लिए नदियों को अभिशाप बना दिया। इनमें से कोसी भी इसी प्रकार की एक नदी है। कोसी के बदलते प्रवाह मार्ग और अप्रत्याशित बाढ़ के केन्द्र में उसकी भौगोलिक स्थिति और मानवीय हस्तक्षेपहै, जिसको जानना और स्वीकार करना हमारे लिए अपरिहार्य है। 1965 ई. में कोसी तटबंध बनकर तैयार हुआ। कोसी की अनियंत्रित धाराओं को तटबंधों के द्वारा नियंत्रित किया गया। तबसे लेकर आज तक कोसी सात बार तटबंधों को तोड़कर मुक्त होने में सफल रही। मसलन कोसी ने जब-जब चाहा तटबंधों को तोड़ डाला। इस तबाही में अब तक पचास हजार से ऊपर लोग कालकवलित हो चुकें हैं। बाढ और तटबंधों के कारण अब तक

मातंगिनी हाजरा: ओल्ड लेडी गांधी, जो थीं आजादी और गांधी की दीवानी

एक स्त्री सब कुछ है, माँ, बहन, देवी  प्यार, दुलार, डाट सब कुछ लेकिन क्या कोई स्त्री गांधी का रूप भी हो सकती हैं। जबाब है, हो सकती हैं। सब कुछ हो सकती है तो गांधी क्यों नहीं। बंगाल की मातंगिनी हाजरा को यानी बूढ़ी गांधी (ओल्ड लेडी गांधी) भी कहा जाता हैं।  तारीख 19 अक्तूबर 1870, स्थान तामलुक, वेस्ट बंगाल के एक गरीब किसान परिवार में मातंगिनी हाजरा का जन्म हुआ। कहते हैं गरीब की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी होती है। वैसे ही गरीब के घर पैदा होने वाली स्त्रियों की शादी फिक्र अधिक होती है, इनके पिताजी को भी इनकी शादी की फिक्र हुई, मात्र बारह साल की आयु में इनकी शादी पचास साल बड़े शख्स से करा दी गई, मातंगिनी हाजरा के लिए कोई सदमे से कम नही था, दुखों का पहाड़ उनके ऊपर छ सालों बाद फिर टूटा, अठारह साल की उम्र में वो विधवा हो गईं।  असहाय, विधवा होने के पश्चात वो मायके में वापस आकर रहने लगीं, लेकिन मायके में उनका कोई आसरा नहीं था, इसी वजह से उन्होंने एक झोपड़ा बनाकर बाहर रहने लगीं, उनकी कोई संतान भी नही थी। बचपन से क्रांतिकारियों के बारे में सुनने में उन्हें आनंद आता था, वो भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अ

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक कदम

सूर्यकांत देवांगन भानुप्रतापपुर, कांकेर छत्तीसगढ़ प्रधानमंत्री ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान कुछ महीनों पहले ही शुरू किया है, लेकिन छत्तीसगढ़ की एक ग्रामीण महिला रेणुका ढीमर ने इसकी शुरूआत आज से चार साल पहले ही कर दी थी। खेती और मजदूरी करके गुजर-बसर करने वाले परिवार की इस बहू ने 2016 में प्रशासन से मिले 25-30 कड़कनाथ के चूजों को पालना शुरू किया, जो समय के साथ बढ़ते चले गए और आज यही रेणुका और उनके परिवार की आय का मुख्य साधन बन गया है। मुर्गीपालन से ही रेणुका की आय हर महीने 15 हजार हो रही है। उनके इस प्रयास की सराहना न केवल गांव के लोग कर रहे हैं बल्कि प्रशासनिक अधिकारी भी समय-समय पर उनके घर पहुंचकर उत्साह बढ़ाते हैं। राजनांदगांव जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ग्राम सुरगी। मुख्यतः खेती-किसानी और मजदूरी पर आश्रित लगभग 3,500 जनसंख्या वाले इस गांव में चार साल पहले प्रशासन की तरफ से 70-80 परिवारों को कड़कनाथ मुर्गीपालन हेतू चूजों का वितरण किया गया था। कुछ महीनों तक पालने के बाद ग्रामीण इस व्यवसाय को छोड़कर वापस अपनी पुरानी दिनचर्या में लग गए। लेकिन कक्षा दसवीं तक शिक्ष

महिलाओं को बनना होगा खुद का हौसला

  रमा शर्मा जयपुर, राजस्थान भारत जैसा देश जंहा युगों से महिलाओं को देवी का रूप में माना जाता है और उसकी पूजा की जाती है। उसी देश में अब महिलाओं पर अत्याचार, हिंसा और शोषण जैसी अमानवीय घटनाएं आम होती जा रही हैं। पूरे देश में महिलाएं हर जगह, हर समय, हर क्षण, हर परिस्थिति में हिंसा के किसी भी रूप का शिकार हो रही हैं। जैसे जैसे देश आधुनिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे महिलाओं पर हिंसा के तरीके और आंकड़ें भी बढ़ते जा रहें हैं। यदि हिंसा के नए रूपों की बात करें तो इनमें अश्लील कृत्य, फूहड़ गाने, किसी महिला की शालीनता को अपमानित करने के इरादे से प्रयोग किये जाने वाले शब्द, अश्लील इशारा, गलत नीयत से पीछा करना, अवैध व्यापार, बदला लेने की नीयत से तेज़ाब डालना, साइबर अपराध और लिव इन रिलेशनशिप के नाम पर शोषण प्रमुख है। जबकि पहले से ही डायन और जादू टोना के नाम पर महिलाओं के साथ शारीरिक शोषण, घरेलू हिंसा, दहेज के नाम पर जलाना, यौन उत्पीड़न और बाल विवाह के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाला हिंसा आज भी बदस्तूर जारी है। अंतर इतना ही है कि हिंसा के ये नए रूप शहरों में अधिक हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में

एटीएम से 5 हज़ार से अधिक पैसे निकलने पर लगेगा अतिरिक्त शुल्क

एक बार फिर एटीएम से पैसों की निकासी करने पर बड़ा बदलाव किया जा रहा है। नए नियम के मुताबिक अब आप को 5 हजार से अधिक पैसे निकालने पर अतिरिक्त शुल्क देना होगा। ये  शुल्क निकासी के दौरान ही ले लिया जाएगा।  इसमें आपको अलग से राशी देने की जरूरत नहीं होगी।  अगर आप एटीएम से एक बार  में 5 हजार से अधिक राशि निकालते है तो आपके आकाउंट से 24 रुपये काट लिये जाएंगे। मौजूदा समय में 5 ट्रांजैक्शन के बाद  छठे ट्रांजैक्शन पर  20  रुपए वसूले जाते है।  दरअसल,भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से एटीएम शुल्क की समीक्षा के लिए पिछले वर्ष 6 सदस्य समिति का गठन किया गया।  जिसने अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इसके  आधार पर बैंक आठ साल बाद एटीएम शुल्क में बदलाव कर सकते हैं।  क्या है समिति की सिफारिश    RBI की एक समिति ने पूरे देश में  एटीएम के माध्यम से सभी  ट्रांजैक्शनों पर शुल्क  बढ़ाने की सिफारिश की है।  इस रिपोर्ट में कहा गया है  प्रति ट्रांजैक्शन की लिमिट  5000 रखी जाए और इससे अधिक निकासी करने पर शुल्क लगाया जाये । 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में  समिति ने चार्ज में 24 फ़ीसदी बढ़ाने की सिफारिश की है। अब यह सब कुछ RBI  पर

परेशान हैं छोटे स्तर के किसान

बसंत पांडे हल्द्वानी, उत्तराखंड  देश की अर्थव्यवस्था में जीडीपी का सर्वाधिक प्रतिशत कमाने वाली कृषि को लेकर जहां एक तरफ देशभर में राजनीति चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ छोटी-छोटी जोतों के मालिक यानि छोटे स्तर के करोड़ो किसान परेशान हैं। सरकारी नीतियों के कारण उन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया है। अब उनके सामने खुद को जीवित रखने की चुनौती आ गई है। कहीं बाढ़, कहीं अकाल तो कहीं मौसम के बदलते मिजाज़ ने पहले ही किसानों की फसलों को बर्बाद कर दिया है। सितम यह है कि उनके हितों की बात करने वाली सरकारें भी उन्हें तन्हां छोड़ चुकी है। इसकी एक बानगी उत्तराखंड के सबसे बड़े गांव बिन्दुखत्ता के किसान हैं। जो कुदरत की मार के साथ साथ कृषि संबंधी सरकार की नीतियों से भी हताश हो चुके हैं।  सरकार के नियमों के अनुसार केवल खाता-खतौनीधारी किसान की उपज ही सरकारी खरीद के नियम के तहत ख़रीदे जायेंगे। इसके चलते देश भर के छोटी जोत के कई खत्तावासी किसान अपनी उपज निजी हाथों में औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। नैनीताल जिले के लालकुंआ तहसील स्थित हज़ारों बिन्दुखत्तावासी किसान धान, सोयाबीन गेहूं व अन्य कृषि उत्पादनों की सरकारी खरी

उत्तराखंड का एक ऐसा नेता जिसे सभी दल के नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

  एनडी तिवारी उत्तराखंड के ऐसे नेता थे जिनकी आज भी लोग  मिसाल देते है । एनडी तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल में हुआ था, तब वह उत्तरप्रदेश का हिस्सा था। यूपी में  एनडी तिवारी का कार्यकाल 1976 से 1977, 1984 से 1985 और 1988 1989 तक रहा.  वही उत्तराखण्ड में 2002 से 2007 तक एनडी तिवारी का शासनकाल रहा।  इसके साथ ही 2007 से 2009 तक वह  आंध्र प्रदेश के गवर्नर भी रहे। 27 साल की उम्र में एनडी तिवारी ने विधानसभा  चुनाव लड़ा लेकिन उन्होंने यह चुनाव कांग्रेस से नहीं प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा  1952 के बाद 1957 मे भी उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और  जीत हासिल कर विपक्ष के नेता बन गए। साल 1963 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।  एनडी तिवारी कांग्रेस के उस समय के नेता हैं  जब  कांग्रेस जमीनी स्तर पर काफी मजबूत हुआ करती थी और उस समय उसके पास जमीनी नेताओं की भरमार होती थी। जो काफी लोकप्रिय भी होते थे, और जनता से डायरेक्ट संपर्क रखते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले नेता वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी  बताते हैं कि नारायण दत्त तिवारी समाजवादी नेता थे भारत के  कई राजनेताओं

नवरात्रि का दूसरा दिन, मां ब्रह्मचारिणी की आराधना का दिन

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ- ब्रह्म मतलब तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली देवी होता है। मां ब्रह्मचारिणी के हाथों में अक्ष माला और कमंडल सुसज्जित हैं। अगर मां का सच्चे मन से पूजन किया जाए तो व्यक्ति को ज्ञान सदाचार लगन, एकाग्रता और संयम रखने की शक्ति प्राप्त होती है। मान्यता के अनुसार इन्हें तप की देवी कहा जाता है. क्योंकि इन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. वह सालों तक भूखे प्यासे रहकर शिव को प्राप्त करने के लिए इच्छा पर अडिग रहीं. इसीलिए इन्हें तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है. ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी माता का यही रूप कठोर परिश्रम की सीख देता है, कि किसी भी चीज़ को पाने के लिए तप करना चाहिए. बिना कठिन तप के कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता.